Saturday, 23 August 2014

इंतज़ार की राह!


Nirav VaidyaNirav Vaidyaideas hunter
जिन रास्तों से घर को चले थे
वो रास्ते बेघर, बेमक़सद हो चले थे
एक मुसाफिर के कई सपने कल यहां जल के राख हो पड़े थे

दिशाएं अपने कारवाँ को ले रुदाली बन बैठी थी
हवाएं दिशाहीन, बेसुरा रो रही थीं

वैसे तो रोज़ यहाँ से कई पाऊँ अपनी पगडंडियां छोड़ जातें हैं
लेकिन जब कोई सच्चा मुसाफिर अपनी पगडंडियों के निशाँ भी अपने साथ ले जाय
तो जैसे रास्तों की मांग से वो सारे सिन्दूरी अरमाँ विधवा हो जातें हैं
वो मंज़िल तक पहंचाने की शान, बेनूर हो जाती है

रास्तों से सच्चा मुसाफिर
मंदिर से भगवान
इंसान से आत्मा
अगर चला जाय
तो
मंज़िलो पे बैठे इंतज़ार को ज़िन्दगी का श्राप लग जाय!

नीरव
  

Saturday, 16 August 2014

My Hindi Poem: वक़्त का किनारा

My Hindi Poem: वक़्त का किनारा: वक़्त का किनारा अगर वक़्त का कोई किनारा होता तो लम्हों की नाव का एक साहिल सहारा होता दो घडी थमके जीने का एक बहाना होता, अगर वक़्त का क...

वक़्त का किनारा

वक़्त का किनारा

अगर वक़्त का कोई किनारा होता
तो लम्हों की नाव का एक साहिल सहारा होता
दो घडी थमके जीने का एक बहाना होता,
अगर वक़्त का कोई किनारा होता

ज़िन्दगी भी मौत के किनारों पे आके उस पार चली जाती है!
हर शख्स को अपना अक्स दिखा जीवन सार समझा जाती है
आईनो के बाज़ार लगा जाती है, मायावी दुनिया में सेवक,साहूकार,
सच झूट, सब को अलग अलग खेमो में बाँट जाती है
काश, (के)
वक़्त भी जवानी के श्राप से निकल,इस पार बूढा होता!
आईना भी अपने वजूद के अहम से निकल,
अपने अक्स का शुक्रगुज़ार होता

वक़्त के धोरे असीम काल से पैदल ही चले हैं
क्या होता जो सूखे पानी का ख्वाब सिकंदर होता
सहराओं में समंदर ही समंदर बह रहा होता
और फिर,
किनारो पे बैठ,
वक़्त, मछलियां पकड़ रहा होता
छूटी माना रहा होता!

नीरव

Monday, 11 August 2014

My Hindi Poem: ये शहर

My Hindi Poem: ये शहर: ये शहर भीड़ में एक सपना कहीं खो गया है ये शहर,लगता है अकेला हो गया है गुब्बारों से लोग सुबह होते ही उम्मीद भर उड़ने लगते है शाम क...

ये शहर

ये शहर

भीड़ में एक सपना
कहीं खो गया है
ये शहर,लगता है
अकेला हो गया है

गुब्बारों से लोग
सुबह होते ही उम्मीद भर
उड़ने लगते है
शाम को थक्क के गिरने लगते हैं

सपनो के दिए
रात के अंधेरों को जलाने में काम आतें हैं
और सवेरे
ज़िम्मेदारियों की भीड़ का उजाला लाद के चले जातें हैं

ये शहर
हकीकत का बोझ लिए
अकेला,
भीड़ में शामिल होकर चल पड़ता है
अपने सपने की तलाश में...
ये शहर
मुँह फाड़ के बैठे समंदर के घर चल पड़ता है

नीरव

Wednesday, 6 August 2014

रात और दिन

रात और दिन

शांतता के दिए में
फड़फड़ा के जी रहा है
घनी रात का...डर

उजालों की नोक पर
तप तप के उधार की सांसें...बटोर,
आनेवाले कल की चिंता से....लहू लुहान,
रात के घाव...सी रहा है

सवेरे,
इस खेल से उठते धुंवे को हवा कर
दिया पलट के सूरज हो चला है
दिन को जीने का हौंसला दे रहा है
रात के आने का न्योता लिख रहा है

ये
सिलसिला यहाँ रोज़ चला है

नीरव

Tuesday, 5 August 2014

मोना लिसा की मुस्कान का रहस्य!


मोना लिसा की मुस्कान का रहस्य!

छिलकों से न पूछो
दर्द क्या है
पेंसिल की नोक से पूछो
जो चित्रकारों के हाथ
कोरे कागज़ की मांग में
मोना लिसा की मुस्कान का सिन्दूर
उम्र भर के लिए पिस देती है

औरत ऐसी हो जो सब को लुभाये
यही बात सब से कहती है
कूड़े में पड़े छिलकों का दर्द
शायद मोना लिसा समझती है
इसीलिए
हमेशा हल्का सा हंसती है!

नीरव वैद्य