Tuesday, 5 August 2014

धर्म कर्म की लूका छुपी!

धर्म कर्म की लूका छुपी!

एक झरने को आता है बेहना
उसे कहाँ पता है
एक दिन दरिया के अहम का होना पड़ेगा
बेहना होगा,
बनके समंदर का गेहना!

एक दरिया है
जो झरनो की लहरों पे चले है
ये राज़ किसी सेहरा से ना केहना
रेत से मृग-अमृत का सुख...सूख जाएगा

एक पंछी का सपना है
आसमान के आखरी सिर्रे को ढूंढना,
बेख़ौफ़ उड़े है
किसीकी भूख का है वो शिकार
उसे ये ना केहना
एक पूरा परिवार... भूखा सो जाएगा!

एक भूख है
जो
पहले मानव की लगाई आग बनके जले है
ज़िन्दगी का चक्र इसी भूख से चले है
अंतिम मानव को ये कभी ना कहना
वरना
झरना थम जाएगा
दरिये का नाक कट जाएगा
पंछी की ऊंची उड़ान देखे बिना
महत्वाकांक्षाओं का दिल टूट जाएगा
शिकारी बेकार हो जाएगा
उसका शिकार एक आदमी हो जाएगा
खून सस्ता होके ख़त्म हो जायेगा

एक धनुर्धर पांडव अकेला पड़ जाएगा
फिर
कृष्ण या राम कोई मार्गदर्शक...कैसे आएगा??

जो जैसा है
चलने दो
झरने को दरयिा में जा
बहने दो
किसी से कुछ ना केहना
हर दिन
नया जीवन है,
तुम
जीते रेहना
कर्म के रास्ते
चलते रहना
येही धर्म है
ये
धर्म से ना कहना!!

नीरव वैद्य








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