Tuesday, 5 August 2014

अनंत का सुई धागा!


अनंत का सुई धागा! (1)

सपनो के धागे
जीवन की घाँठे
और
सुई के छेद सा
मैं!

सेहरा सा फैला...इंतज़ार
आँखों में तरस का बेशुमार...विस्तार
और
मृग तृष्णा के जल सा
मैं!

रग्गों में दौड़ा शहरी खून
पॉकेट में चाकू,बन्दूक,पैसा,पेट्रोल,जूनून
और
नसों को चीरकर, हॉर्न बजाती,शरीर के बहार निकल जाती ७.४५ की ट्रैन सा
मैं !

इस शहर के ट्रैफिक में इस तरह घुलमिल जाता हूँ
जैसे
कोई परप्रांतीय यहाँ की भीड़ और उसकी भूख का हो जाता है

कौन किसका है
वो
भूल जाता है
सुई,
सपनो के धागे निगल जाती है
और
आदमी
रिश्तों और नातों के रेशों में,
बिखर के रह जाता है!

कल,
यहाँ फिर से,
एक और मुसाफिर
ज़िन्दगी और सपने...बुनने,
"जीवन का सुई धागा" ले आ जाता है!

और पानी के स्वाभाव सा
मैं
प्यास की धार बनकर!
शहर के किसी लावारिस नल से
टपकके
धरती में छेद किये जा रहा हूँ!

नीरव वैद्य




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