Wednesday, 6 August 2014

रात और दिन

रात और दिन

शांतता के दिए में
फड़फड़ा के जी रहा है
घनी रात का...डर

उजालों की नोक पर
तप तप के उधार की सांसें...बटोर,
आनेवाले कल की चिंता से....लहू लुहान,
रात के घाव...सी रहा है

सवेरे,
इस खेल से उठते धुंवे को हवा कर
दिया पलट के सूरज हो चला है
दिन को जीने का हौंसला दे रहा है
रात के आने का न्योता लिख रहा है

ये
सिलसिला यहाँ रोज़ चला है

नीरव

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