ये शहर
भीड़ में एक सपना
कहीं खो गया है
ये शहर,लगता है
अकेला हो गया है
गुब्बारों से लोग
सुबह होते ही उम्मीद भर
उड़ने लगते है
शाम को थक्क के गिरने लगते हैं
सपनो के दिए
रात के अंधेरों को जलाने में काम आतें हैं
और सवेरे
ज़िम्मेदारियों की भीड़ का उजाला लाद के चले जातें हैं
ये शहर
हकीकत का बोझ लिए
अकेला,
भीड़ में शामिल होकर चल पड़ता है
अपने सपने की तलाश में...
ये शहर
मुँह फाड़ के बैठे समंदर के घर चल पड़ता है
नीरव
भीड़ में एक सपना
कहीं खो गया है
ये शहर,लगता है
अकेला हो गया है
गुब्बारों से लोग
सुबह होते ही उम्मीद भर
उड़ने लगते है
शाम को थक्क के गिरने लगते हैं
सपनो के दिए
रात के अंधेरों को जलाने में काम आतें हैं
और सवेरे
ज़िम्मेदारियों की भीड़ का उजाला लाद के चले जातें हैं
ये शहर
हकीकत का बोझ लिए
अकेला,
भीड़ में शामिल होकर चल पड़ता है
अपने सपने की तलाश में...
ये शहर
मुँह फाड़ के बैठे समंदर के घर चल पड़ता है
नीरव
No comments:
Post a Comment