आतंक
हर तरफ कालिक पोते है
धुवां न होके,
जैसे कोई बेबाक बच्चा
डरा डरा सा अपनी जान बचाने भाग रहा हो!
आतंक के माहोल में
छुपने को कहीं जगह भी तो नहीं होती!
घायल इंसानो के चेहरों पे जैसे डरावना कोई नक़ाब बनके
ठहर गया है, अपने आप से छिप गया है!
खून से लथपत शवों पे साँसों की जली हुई सिसकियाँ ले रहा है
ज़िन्दगी को करीब से महसूस कर रहा है
डर डर के टूटे है
उड़ उड़ के बिखरे है
बच्चों,बूढ़ों,औरतों और नम हो गए मर्दों के गलों में जा,
चीखों को दबो रहा है'
गहरे मनोवैज्ञानिक घाव के कुंवे और नयी नस्ल को बो रहा है!
शहर के बीचो बीच
बम फटा है
एक मासूम हवा का झोंका
फटे हुवे बम के धुवें से जा मिला है
कल तक इंसान के दिमाग में कीड़े ट्यूमर पैदा करते थे
आज आतंक पैदा हुवा है!
नीरव वैद्य
हर तरफ कालिक पोते है
धुवां न होके,
जैसे कोई बेबाक बच्चा
डरा डरा सा अपनी जान बचाने भाग रहा हो!
आतंक के माहोल में
छुपने को कहीं जगह भी तो नहीं होती!
घायल इंसानो के चेहरों पे जैसे डरावना कोई नक़ाब बनके
ठहर गया है, अपने आप से छिप गया है!
खून से लथपत शवों पे साँसों की जली हुई सिसकियाँ ले रहा है
ज़िन्दगी को करीब से महसूस कर रहा है
डर डर के टूटे है
उड़ उड़ के बिखरे है
बच्चों,बूढ़ों,औरतों और नम हो गए मर्दों के गलों में जा,
चीखों को दबो रहा है'
गहरे मनोवैज्ञानिक घाव के कुंवे और नयी नस्ल को बो रहा है!
शहर के बीचो बीच
बम फटा है
एक मासूम हवा का झोंका
फटे हुवे बम के धुवें से जा मिला है
कल तक इंसान के दिमाग में कीड़े ट्यूमर पैदा करते थे
आज आतंक पैदा हुवा है!
नीरव वैद्य
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