Saturday, 23 August 2014

इंतज़ार की राह!


Nirav VaidyaNirav Vaidyaideas hunter
जिन रास्तों से घर को चले थे
वो रास्ते बेघर, बेमक़सद हो चले थे
एक मुसाफिर के कई सपने कल यहां जल के राख हो पड़े थे

दिशाएं अपने कारवाँ को ले रुदाली बन बैठी थी
हवाएं दिशाहीन, बेसुरा रो रही थीं

वैसे तो रोज़ यहाँ से कई पाऊँ अपनी पगडंडियां छोड़ जातें हैं
लेकिन जब कोई सच्चा मुसाफिर अपनी पगडंडियों के निशाँ भी अपने साथ ले जाय
तो जैसे रास्तों की मांग से वो सारे सिन्दूरी अरमाँ विधवा हो जातें हैं
वो मंज़िल तक पहंचाने की शान, बेनूर हो जाती है

रास्तों से सच्चा मुसाफिर
मंदिर से भगवान
इंसान से आत्मा
अगर चला जाय
तो
मंज़िलो पे बैठे इंतज़ार को ज़िन्दगी का श्राप लग जाय!

नीरव
  

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