Saturday, 16 August 2014

वक़्त का किनारा

वक़्त का किनारा

अगर वक़्त का कोई किनारा होता
तो लम्हों की नाव का एक साहिल सहारा होता
दो घडी थमके जीने का एक बहाना होता,
अगर वक़्त का कोई किनारा होता

ज़िन्दगी भी मौत के किनारों पे आके उस पार चली जाती है!
हर शख्स को अपना अक्स दिखा जीवन सार समझा जाती है
आईनो के बाज़ार लगा जाती है, मायावी दुनिया में सेवक,साहूकार,
सच झूट, सब को अलग अलग खेमो में बाँट जाती है
काश, (के)
वक़्त भी जवानी के श्राप से निकल,इस पार बूढा होता!
आईना भी अपने वजूद के अहम से निकल,
अपने अक्स का शुक्रगुज़ार होता

वक़्त के धोरे असीम काल से पैदल ही चले हैं
क्या होता जो सूखे पानी का ख्वाब सिकंदर होता
सहराओं में समंदर ही समंदर बह रहा होता
और फिर,
किनारो पे बैठ,
वक़्त, मछलियां पकड़ रहा होता
छूटी माना रहा होता!

नीरव

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